कैप्टन बत्रा तो कहकर गए थे कि या तो तिरंगा फहरा के आऊंगा या तिरंगे में लिपटकर, कैप्टन अनुज ने कहा था- जब तक आखिरी दुश्मन है, मैं सांस लेता रहूंगा

लेकिन, जब उनके एम्युनेशन खत्म हो गए तो पाकिस्तान ने उन्हें बंदी बना लिया। इस दौरान पाकिस्तानियों ने उन्हें कई तरह की यातनाएं दी और अंत में गोली मारकर हत्या कर दी। 22 दिन बाद 9 जून को कैप्टन कालिया का शव भारत को पाकिस्तान ने सौंपा था। उस समय उनके चेहरे पर न आंखें थीं न नाक-कान थे। सिर्फ आईब्रो बची थी जिससे उनकी बॉडी की पहचान हुई।

2. कैप्टन विक्रम बत्रा.


4. मेजर राजेश सिंह अधिकारी
मेजर राजेश सिंह का जन्म 25 दिसंबर 1970 को उत्तराखंड के नैनीताल में हुआ था। 11 दिसंबर 1993 को वे इंडियन मिलिट्री अकेडमी से ट्रेनिंग के बाद इन्फेंट्री रेजीमेंट का हिस्सा बने। करगिल युद्ध के दौरान वे 18 ग्रेनेडियर का हिस्सा थे। 29 मई 1999 को भारतीय फौज ने तोलोलिंग पर कब्जा कर लिया था।
इसके बाद 30 मई को मेजर राजेश अधिकारी की टीम को तोलोलिंग से आगे की पोस्ट को दुश्मन के कब्जे से छुड़ाने की जिम्मेदारी मिली। राजेश अपनी टीम को लीड कर रहे थे। इस दौरान उन्हें गोली लगी लेकिन उन्होंने पीछे जाने से इनकार कर दिया। गोली लगने के बाद भी वे लड़ते रहे और तीन दुश्मनों को मार गिराया।
30 मई 1999 को वे शहीद हो गए। उन्हें मरणोपरांत दूसरे सर्वोच्च भारतीय सैन्य सम्मान महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था

5. मेजर विवेक गुप्ता
मेजर विवेक गुप्ता का जन्म देहरादून में हुआ था। उनके पिता कर्नल बीआरएस गुप्ता फौजी थे। एनडीए की परीक्षा पास करने के बाद उनकी पहली पोस्टिंग 13 जून 1992 को 2 राजपूताना राइफल्स में हुई।करगिल युद्ध के दौरान उनकी टीम को प्वाइंट 4590 को दुश्मन के कब्जे से छुड़ाने की जिम्मेदारी मिली।
12 जून को उनकी टीम रवाना हो गई। दुश्मन ऊंचाई पर थे, उन्हें पता चल गया कि भारतीय फौज आ गई है। दोनों तरफ से जमकर फायरिंग हुई। मेजर गुप्ता को दो गोलियां लगी लेकिन उसके बाद भी उन्होंने तीन दुश्मनों को मार गिराया और पाकिस्तान के कई बंकरों को तबाह कर दिया। 13 जून 1999 को मेजर विवेक गुप्ता शहीद हो गए। उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था।

मेजर डीपी सिंह एक ऐसा योद्धा जिसने कभी हार मानना स्वीकार नहीं किया। उनके जुनून और जज्बे के सामने पहाड़ सी मुश्किलें भी छोटी पड़ गईं। करगिल युद्ध के दौरान वो बुरी तरह घायल हो थे। उनका एक पैर बुरी तरह जख्मी हो चुका था, बाकी शरीर पर 40 से ज्यादा घाव थे।
शरीर से खून के फव्वारे उड़ रहे थे। अस्पताल पहुंचते ही डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया लेकिन, फिर भी वो बच गए। आज वे ब्लेड रनर नाम से पूरी दुनिया में फेमस हैं। चार बार गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज करा चुके हैं।




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source https://www.bhaskar.com/db-original/news/kargil-vijay-diwas-stories-of-kargil-war-heros-captain-vikram-batra-major-dp-singh-captain-saurabh-kalia-127553334.html

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